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kala pani ki saja |
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनेक वीर गाथाओं से भरा हुआ है। उन महान स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने जीवन का बलिदान देकर देश को आज़ादी दिलाई। परंतु, इस संघर्ष के दौरान उन्हें जो यातनाएँ सहनी पड़ीं, उनमें सबसे क्रूर और कष्टदायक सजा थी "काला पानी की सजा"। यह सजा भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के लिए एक भयावह दंड के रूप में जानी जाती है। इस सजा का उल्लेख मात्र ही उस समय के लोगों को भयभीत कर देता था। यह दंड इतना कठोर था कि इसे मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक माना जाता था।
काला पानी की सजा क्या थी?
काला पानी की सजा का अर्थ था, अपराधियों या स्वतंत्रता सेनानियों को अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की सेलुलर जेल (जिसे काला पानी भी कहा जाता है) में भेजना। इस जेल में कैदियों को अमानवीय यातनाएँ दी जाती थीं। काला पानी शब्द का अर्थ है समुद्र पार की सजा। उस समय यह विश्वास था कि समुद्र पार जाने से व्यक्ति की जाति भ्रष्ट हो जाती है। जाति प्रथा और धार्मिक मान्यताओं के कारण समुद्र पार करना सामाजिक बहिष्कार के समान माना जाता था।
काला पानी की सजा का इतिहास
ब्रिटिश शासनकाल में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने भारतीय क्रांतिकारियों को कठोरतम सजा देने के लिए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को चुना। 1858 में, अंग्रेजों ने विद्रोहियों को शांत करने के लिए दमनचक्र चलाया और हजारों भारतीयों को मौत के घाट उतार दिया। लेकिन जिन लोगों को फांसी नहीं दी गई, उन्हें काला पानी की सजा देकर अंडमान भेजा गया। 1896 में सेलुलर जेल का निर्माण आरंभ हुआ और 1906 में यह बनकर तैयार हुई। इस जेल में 693 कोठरियाँ थीं, जिन्हें विशेष रूप से राजनीतिक कैदियों के लिए निर्मित किया गया था। इस जेल का निर्माण ऐसा किया गया था कि हर कोठरी अलग-थलग हो, जिससे कैदियों को एक-दूसरे से बात करने तक का अवसर न मिले।
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cellular jail |
सेलुलर जेल की संरचना और उसका उद्देश्य
सेलुलर जेल को इस प्रकार डिज़ाइन किया गया था कि कैदी एक-दूसरे से संपर्क न कर सकें। इसमें सात शाखाएँ थीं, जो केंद्र से बाहर की ओर फैली हुई थीं, जैसे किसी साइकिल के पहिये की तीलियाँ। हर शाखा में कई कोठरियाँ थीं, और हर कोठरी इतनी छोटी थी कि उसमें खड़े होने और लेटने के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता था। इस जेल का मुख्य उद्देश्य कैदियों को मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ देना था।
कैदियों को दी जाने वाली यातनाएँ
कैदियों को कोल्हू में बैल की तरह जोतकर तेल निकालने का काम करवाया जाता था।
उन्हें कड़ी धूप में पेड़ काटने और लकड़ियाँ ढोने का कठिन परिश्रम करना पड़ता था।
छोटी-छोटी गलती पर कोड़े बरसाए जाते थे और कभी-कभी तो भोजन और पानी तक नहीं दिया जाता था।
मानसिक यातनाएँ दी जाती थीं, जिससे कैदी आत्महत्या करने तक मजबूर हो जाते थे।
कैदियों को लोहे की बेड़ियों में जकड़कर रखा जाता था, जिससे वे न चल पाते थे और न ही आराम कर पाते थे।
कई बार कैदियों को बिना किसी अपराध के ही दंडित किया जाता था, ताकि वे मानसिक रूप से टूट जाएँ।
कैदियों को शारीरिक श्रम के साथ-साथ मानसिक प्रताड़ना भी दी जाती थी, जिससे उनका आत्मविश्वास टूट जाए।
प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी
काला पानी की सजा भुगतने वालों में वीर सावरकर, बटुकेश्वर दत्त, योगेश्वर चट्टोपाध्याय, विनायक दामोदर सावरकर, और अनेक क्रांतिकारियों के नाम उल्लेखनीय हैं। इन महान विभूतियों ने कठोर यातनाएँ सहने के बाद भी अपने संकल्प को नहीं तोड़ा।
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kala pani jail |
वीर सावरकर और काला पानी
वीर सावरकर को 1911 में दो बार उम्रकैद की सजा सुनाई गई, जिसे काला पानी की सजा के रूप में अंडमान भेजा गया। वहाँ उन्हें 10 वर्षों तक अमानवीय यातनाएँ सहनी पड़ीं। उन्होंने जेल में ही अपने विचारों को संकलित किया और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। उन्होंने वहाँ पर अपने क्रांतिकारी लेख लिखे, जिन्हें चुपके से बाहर भेजा जाता था।
कालापानी की सजा वीडियो
काला पानी की सजा का प्रभाव
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को और अधिक उग्र रूप मिला।
क्रांतिकारियों का मनोबल टूटने के बजाय और दृढ़ हुआ।
जनता में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति आक्रोश बढ़ा।
अंडमान निकोबार द्वीप समूह का ऐतिहासिक महत्व बढ़ गया।
इस सजा ने भारतीयों के मन में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा रोष उत्पन्न किया।
इस सजा ने भारतीयों को यह एहसास कराया कि आज़ादी की कीमत कितनी बड़ी है।
स्वतंत्रता के बाद का दौर
भारत की स्वतंत्रता के बाद सेलुलर जेल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया। आज यह स्थल उन वीरों की स्मृति को जीवित रखने का कार्य करता है, जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। यह स्थल आज भी पर्यटकों और देशभक्तों को स्वतंत्रता संग्राम की याद दिलाता है।
आज की पीढ़ी के लिए काला पानी की सजा एक ऐतिहासिक घटना हो सकती है, लेकिन यह हमें यह सिखाती है कि स्वतंत्रता कितने संघर्ष और बलिदान के बाद प्राप्त होती है।
काला पानी की सजा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक काला अध्याय है, लेकिन यह उन वीर सेनानियों के साहस और बलिदान की गाथा भी है, जिन्होंने अंग्रेजों की क्रूरता के सामने झुकने के बजाय अपने प्राणों की आहुति दी। आज जब हम स्वतंत्रता का आनंद लेते हैं, तब हमें उन वीरों की कुर्बानियों को स्मरण कर उन्हें नमन करना चाहिए। साथ ही, यह हमारा कर्तव्य है कि हम देश की एकता और अखंडता को बनाए रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
काला पानी की सजा क्यों दी जाती थी? उत्तर: काला पानी की सजा मुख्य रूप से स्वतंत्रता सेनानियों और अपराधियों को दी जाती थी, ताकि उन्हें समाज से दूर रखा जा सके और उनका मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न किया जा सके। ब्रिटिश सरकार भारतीय क्रांतिकारियों को तोड़ने के लिए यह कठोर दंड देती थी।
सेलुलर जेल कहाँ स्थित है? उत्तर: सेलुलर जेल भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर में स्थित है। इसे काला पानी की सजा के केंद्र के रूप में जाना जाता है।
वीर सावरकर को काला पानी की सजा कब मिली थी? उत्तर: वीर सावरकर को 1911 में दो बार आजीवन कारावास (50 वर्ष) की सजा सुनाई गई थी, जिसके तहत उन्हें सेलुलर जेल, अंडमान भेजा गया था।
काला पानी की सजा का क्या प्रभाव पड़ा? उत्तर: काला पानी की सजा ने स्वतंत्रता संग्राम को और अधिक बल दिया। कैदियों पर अमानवीय अत्याचार ने भारतीयों में ब्रिटिश शासन के प्रति आक्रोश बढ़ा दिया। यह सजा स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान की प्रतीक बन गई।
काला पानी की सजा किसे कहा जाता है? उत्तर: समुद्र पार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की सेलुलर जेल में दी जाने वाली कठोर सजा को काला पानी की सजा कहा जाता था। यह सजा इतनी कठोर थी कि इसे मृत्यु से भी अधिक पीड़ादायक माना जाता था।
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